Saturday, February 8, 2014

মনের মণিকোঠা থেকে ৪

মনের মণিকোঠা থেকে ।।৪।।

আমি তখন স্কুলের উচ্চতম ক্লাসে, একটা চাপা অহংবোধ কেন জানিনা মনে মনে কাজ করত । এক বর্ষার দিনে কিভাবে যেন স্কুল তাড়াতাড়ি ছুটি হয়ে যাওয়ায় আমি আর আমার মৈথিলি বন্ধু প্রমোদ মিশ্র হেঁটে বাড়ী ফিরছি ভিজে ভিজে । এমন সময় দেখি একটি প্রাইমারি স্কুলের বাচ্চা ছাত্র একটি পাথরের উপর একা বসে একনাগাড়ে কেঁদে যাচ্ছে । ওদের ক্লাস তো দু-ঘণ্টা আগেই শেষ হয়ে গেছে । আমি তাকে নাম-ঠিকানা জিগ্যেস করায় সে কিছুই বলতে পারেনা । শেষে প্রমোদ বুদ্ধি করে শুধোয়, তোদের বাড়ীর সামনে কি আছে, মা...ঠ, না স্কুল না বাড়ী । কারখানা আছে- ও বলে, ধোঁয়া বেরোয় ।
- আর কি আছে ?
- অনেক গরু ।
- খাটাল ?
- হ্যাঁ । বলে সে আবার কাঁদতে লাগল ।

ফ্যাক্টরির সামনের মজদুর কলোনীর মনে হচ্ছে, প্রমোদ বলল, চ, একে বাড়ী পৌঁছে দি ।
- কিন্তু আমাদের বাড়ীর রাস্তায় নয় যে, তাছাড়া বৃষ্টি হচ্ছে-
- আরে হায়ার ক্লাসের ছাত্র হয়ে এটুকু করতে পারব না আমরা ! তাছাড়া আজকে ছিঁকন পণ্ডিত কি পড়াল- 'পরোপকারায় সতাং বিভূতয়ঃ', নয় কি ?
- হুঁ, আমি সংক্ষেপে সায় দিলাম । যেটা বলতে পারলাম না সেটা এই যে আমরা ত সাধু-সন্ত নই রে বাবা, আমাদের কি দায় পড়েছে পরোপকারের !
- ঠিক আছে, আমি বাচ্চাটিকে বললাম, চ আমাদের সাথে । বাড়ি চিনতে পারবি ত?
- হ্যাঁ । ছেলেটি কান্না থামিয়ে বলল ।
যথাস্থানে ছেলেটিকে জমা দেওয়ার সময় কিন্তু আমাদের সেই হিরো-ভাবটা আর থাকেনি । ছেলেধরা সন্দেহে বস্তিবাসিরা তাড়া করায় প্রাণ নিয়ে ছুটে পালাই দুজনে ।

পরোপকার করার ভাল পুরস্কার জুটল রে আজ- বাড়ির কাছাকাছি পৌঁছে আমি যখন এগুলো প্রমোদকে শোনাচ্ছি, আমাকে অবাক করে দিয়ে সে যে কথাগুলি বলল তার সোজা মানে হচ্ছে -'তুমি অধম বলিয়া আমি উত্তম না হইব কেন ?'
- এই তুই বঙ্কিমের 'কপালকুণ্ডলা' পড়েছিস নাকি ?
- 'কপালকুণ্ডলা'- উও কোন সি চিড়িয়া কা নাম হ্যায় ?

বোঝা গেল মনুষ্যজাতির এই দুর্দিনেও নবকুমাররা সর্বত্রই আছেন, নব নব রূপে, নব নব নামে ।
 December 22, 2013


মনের মণিকোঠা থেকে ৩

মনের মণিকোঠা থেকে ।।৩।।

টিফিনশেষের ঘণ্টা এইমাত্র বাজল, সিন্‌হা স্যরের ইংরাজি ক্লাস আছে একটু পরেই । হঠাৎ জানালা দিয়ে দেখা গেল, প্রিন্সিপাল তাঁর সুদৃশ্য লোহাবাঁধানো ছড়িটি বগলদাবা করে ক্লাস এইটের কোন সেকশনের দিকে যাচ্ছেন । এমন সময় একজন কেউ, তার নাম বলব না, 'বোর্ণভিটা' বলে চেঁচিয়ে উঠল । ঐ নামটি ধরে আমাদের হৃষ্টপুষ্ট চেহারার প্রিন্সিপালকে ডেকে আমরা সবাই মজা পেতাম, তাই বলে তাঁকে শুনিয়ে ডাকার কথা কখনও ভাবতে পারি নি ।

যা ভেবেছিলাম তাই ঘটল। রাগে গনগনে লালমুখে কাঁপতে কাঁপতে তিনি আমাদের ক্লাসরুমে এসে ঢুকেই তলব করলেন ছাত্রটিকে যে তাঁকে ঐ নামে সম্বোধিত করেছিল। কিন্তু কে তা স্বীকার করবে। উনিও বুঝে গেছেন যে আমরা অনেকেই জেনেও বলছি না। তখন ক্লাসসুদ্ধ সবার জন্যে দণ্ড ঘোষণা হল- দণ্ডাঘাত। আমাদের প্রসারিত হাতের তালুর উপর নেমে এলো লোহা বাঁধা লাঠির আঘাত, একে একে- তবু কেউ মুখ খুলিনি। তার পরের তিন-চারদিন আমরা কেউ হাত নাড়তে পারিনি।

পরে ভেবেছিলাম, কাকে আমরা শাস্তি থেকে রক্ষা করলাম, সে তো দোষ স্বীকার না করে সবাইকে বাধ্য করল শাস্তি পেতে! তবু আজ ঘটনাটা মনে করলে ভাবি, একটা সমগ্র ক্লাসের একাত্মবোধের যা দৃঢ়তা দেখিয়েছিলাম আমরা সেদিন, তা সব ভারতবাসী দেখাতে পারলে ভারত হয়ত আরো আগেই স্বাধীন হয়ে যেত, কিংবা হয়ত, কে বলতে পারে, পরাধীনই হত না ।
December 21, 2013


মনের মণিকোঠা থেকে ২

মনের মণিকোঠা থেকে ।।২।।

আমাদের ক্লাসের শংকরের কথা একদিন বলেছিলাম, মনে আছে? শংকর সিংহ, যে আমাদের শিক্ষক- ছাত্র থেকে দারোয়ান- ফুচকাওয়ালা, সবাইকে তার আনপ্রেডিক্টেব্‌ল্‌ উইট দিয়ে ব্যতিব্যস্ত করে রাখত । আগে যেটা বলেছি সেটাই রিপীট করছি প্রথমে, তাতে শংকরের কিছুটা প্রাথমিক পরিচয় পাওয়া যাবে । বাংলার ক্লাসে হরিদাস স্যর হংসডিম্বের ব্যাসবাক্য জিগ্যেস করেছেন । আমি 'হংসের ডিম্ব' বলে ইতিমধ্যে একটি গাঁট্টা উপার্জন করেছি । লঘুপাপে গুরুদণ্ড হয়ে গেল মনে করে স্যর তখন বুঝিয়ে বললেন, ওরে বোকা, হংস...ের কি ডিম হয়, ডিম তো হংসী পাড়ে!
আমরা সমঝদারের মত মাথা নাড়ছি, এমন সময় শ্রীমান শংকর ফস্‌ করে বলে বসল, স্যর , তাহলে অশ্বডিম্ব কি হবে?
এইবার হরিদাস স্যর পড়লেন বিপদে । বেশ খানিকক্ষণ মাথা চুলকে বললেন, মনে হয় 'অশ্বের ডিম্ব' আর 'অশ্বীর ডিম্ব' দুটোই চলবে, কারণ দুটোই সমান অসম্ভব ।
সেসময় আমাদের শহরের একমাত্র সিনেমাহলে কোনও ছোটদের দেখার ভালো বই এলে স্কুলের উদ্যোগে একটি শো-এর জন্য হলভাড়া নিয়ে ছাত্রদেরকে নামমাত্র দক্ষিণায় সিনেমাটি দেখান হত । বলা বাহুল্য, শিক্ষকদের কোনও টিকিট লাগতো না ।
সে সময় ছোট শহরে মধ্যবিত্তের সংখ্যাই ছিল বেশী । তাই অধিকাংশ লোকেই ব্যালকনি বা ড্রেস সার্কেলে টিকিট কাটতেন না, সীটগুলো প্রায় ফাঁকাই থাকত । সেদিন কিন্তু সুযোগ পেয়ে অল্পবিত্ত শিক্ষকরাও ব্যালকনি দখল করে বসতেন ।
সেদিনের ছবি ছিল 'হাম পঞ্ছী এক ডাল কে' । পরদিন স্বভাব-রসিক হরিদাস স্যর ক্লাসে জিগ্যেস করছেন, কিরে, কাল সিনেমা কেমন দেখলি? 'ভাল, খুব ভাল', আমরা সমস্বরে বললাম । 'কিরে, শংকর কিছু বলবি? তোর অভিজ্ঞতাটাও শুনি'।
- স্যর, ভয়ে বলব, না নির্ভয়ে ? যাত্রাদলের সেনাপতির মত শুধোল শংকর ।
- ভয়ের কি আছে রে? বল, বল ।
- স্যর, ব্যালকনিতে বেজায় ভীড় !

সিনেমা কেমন দেখলি-র উত্তরে এখনও আমরা ক্লাসমেটরা শংকরের ভাষায় জবাব দিই, ব্যালকনিতে বেজায় ভীড় ।




মনের মণিকোঠা থেকে ১

মনের মণিকোঠা থেকে ।। ১ ।।

এম-কে-জি ফিজিক্স পড়াচ্ছেন, নিউটন'স ল অফ কুলিং । আমরা মনে মনে ভাবছি এই নিউটন নামক ভদ্রলোকের কি খেয়ে-দেয়ে আর কোনও কাজ ছিল না, পদার্থ, রসায়ন, গণিত সর্বত্র নাক গলান ছাড়া । ছাত্রদের জীবন্গুলোকে একাই দুর্বিষহ করে তুলেছেন, আপেলের বদলে কেন যে তিনি নারকেল গাছের তলে বসেননি! এদিকে ভারত-পাকিস্তান ক্রিকেট টেস্ট চলছে, অথচ শোনার উপায় নেই ।
হঠাৎ দেখি প্রফেসার লেকচার থামিয়ে ভ্রূ কুঁচকে দাঁড়িয়ে পড়েছেন । পেছনের সীটে বসে কোনও ইডিয়ট ট্রান্‌জিস্টর শুনছিল, বিশ্বনাথ বাউন্ডারি মারায় হঠাৎ করে ভল্যুমটা বেড়ে গেছে । এম-কে-জি ধরে ফেলেছেন কালপ্রিটকে । প্রাইভেট কলেজ, তাও আবার মিশনারিদের, জানিনা কি হতে চলেছে । রুদ্ধশ্বাসে অপেক্ষা করছি আমরা ।
খট-খট-খট... কাঠের স্টেপ্স-এ প্রফেসারের পায়ের শব্দ এগিয়ে গেল যেখানে বসে শৈলেশ জৈন, বেচারা সেটটা পকেটে ঢোকাবার সুযোগ সুদ্ধ পায়নি । প্রফেসার শৈলেশের সীটের কাছে গিয়ে দাঁড়ালেন, তারপর ধমকানোর সুরে বললেন-

- ইয়েস, হোয়াট ইস দ্য স্কোর ?

राम गरुड़ के बच्चे

राम गरुड़ के बच्चे


राम गरुड़ के बच्चे, दिलके तो हैं सच्चे, 
पर हँसने की बात करो तो खा जायेंगे कच्चे!

रहते हैं वे डरे, मन में शंका भरे
गलती से भी हँस दे कोई, बेशक जाएं मरे। 

डरते हैं सोने से, बात करें अपने से 
अपने आप को धमकाते हैं, मारेंगे हँसने से!

जंगल में न जाएं- मीठे फल न खाएं
चलती पवन के गुदगुदाहट कहीं न दे हँसाये!

बेचैनी है दिल में, आसमान के कोने में
हलके बादल हँसी फैलाये, डरते मन ही मन में। 

पेड़-पौधों के तले जुगनू जगमग जले
हॅंसने को तो जी ललचाये, मुश्किल से ही संभले। 

क्या तुझे है खबर, बेवजह हँस हँस कर 
रामगरुड़ को चोट पहुंचाता, थोड़ा तो समझा कर!

रामगरुड़ का महल- आंसू से धुले हर पल, 
हँसना तो दूर, पास न आए हलकी हवा की हलचल!!

(By Sukumar Roy. Translated)




बड़ी मुश्किल


सब लिखे हैं इस किताब में दुनिया की सारी बातें 
सरकारी किन दफ्तर में कौन अफ़सर क्या भाव खाते।
चटनी कैसे बनायीं जाती, कैसे बनाते हैं पुलाव 
घरेलु सब नुस्खों के दिए गए सारे सुझाव। 
साबुन स्याही दन्त-मंजन बनाने के सारे कायदे 
पूजा और त्यौहार सभी पंचांग के जितने फ़ायदे।   
सभी तो हैं, फिर भी देखो, कहीं भी न है लिखा 
पीछे पड़ा है पगला सांड, उससे बचने का तरीका!    



खिचड़ी 

हंस तो था, साही भी, व्याकरण मानूं ना  
कैसे जुड़े 'हंसाही' बन गए जानूं ना।  
बक बोला ए कछुआ, वाह रे क्या फुर्ति,
लाजवाब हमारी यह 'बकछुआ' मूर्ति। 
तोती यानी सुग्गि बोली ओ गिरगिट भैया,
कीड़े छोडो मिर्ची खाओ बदलो रवैया।
जिराफ़ न चाहे अब यहाँ-वंहा घूमने 
फतिंगा संग मिला वह भी लगा उड़ने। 
गाय कहे हाय राम, रोग मुझे क्या लगा?
मेरे पीठ चढ़े क्यों बेवकूफ यह मुर्गा?
'हस्तीमि' देख हाल, तिमि को चाहिए जल  
हाथी कहे यही मौका, चल चलें जंगल।   
सिंह के सींग न थे, कष्ट था मन में 
हिरन से नाता जोड़ा सींग मिले क्षण में।  


नीचे के खिचड़ी जानवर -

"हंसाही" "बकछुआ"
 "सुग्गिरगिट" "मुर्गाय" "हस्तीमि" "सिंहिरन" "जिराफ़तिंगा"
   






मूंछ चोरी



हेड ऑफिस का बड़ा बाबू आदमी शांत थे बड़े    
किसको था मालूम कि उनके दिमाग थे ऐसे बिगड़े?
मस्ती में थे खुश मिजाज बैठे कुर्सी के ऊपर  
अकेले में ही यूँ अचानक बिगड़ा क्या उनका सर? 
हकचकाके हाथ-पांव फेंके ऐसे गए अखड़
चिल्ला उठे "मैं मर गया रे, कोई तो मुझे पकड़।"
सुनकर कोई बुलाये पोलिस, कोई चीखे डाक्टर  
कोई कहे, संभालके पकड़ो, कहीं न भागे डंसकर      
व्यस्त सभी इधर-उधर करते हैं दौड़ादौड़ी,
बाबू बोले, "ओ भाई रे मेरी मूछें गयी हैं चोरी!"   
मूछें खोयी हैं? अजीब बात, ऐसा भी होता सचमुच?
मूछें तो बस वैसी ही है कम तो नहीं हुई कुछ!
सभी उन्हें कितना समझाए सामने पकड़े आइना 
मूछें नहीं होती हैं चोरी, कभी ऐसी हुई ना।
गुस्से से लाल तमतमाते गाल बाबू ऐसे भड़के-       
"भरोसा नहीं किसी पे मुझको हाल पता है सबके।  
झाड़ू जैसी गन्दी भद्दी कूड़ा जैसी कुचैली 
श्यामलाल के दूधवाले सी बदसूरत और मैली!       
ये मूछें जो मेरी बताया जान लूंगा एक-एक की।"   
यह कहकर बाबू ने झट जुर्माने लगाए सब की।
खाता खोलकर लिख दिया गुस्से से वेहद तड़पे
"किसी की भी भलाई न करना, चढ़ जाते सब सर पे। 
ऑफिस में सब गधे भरे हैं, सर के अंदर गोबर 
मूछ की जोड़ी कहाँ खोयी है कोई न जाने ख़बर!
जी करता इन बदमाशों की मूछें पकड़ उखाडूँ  
बेवकूफों के भेजे में उस्तरा चलाकर फाड़ूं।     
मूछ को बोले तेरी-मेरी, ये बेचे कौन दुकान!  
मूछ की मैं या मूछ की तू, है हमारी पहचान।"   


हुक्का-मुहा हकला निवास था बँगला  
चेहरा उतरा तेरा काहे रे?
हंसी मुंह से उड़ा है क्यों ऐसा हुआ है   
कोई तो मुझे समझाओ रे । 
श्यामादास मामा था, नशेड़ी अफीम का  
और कोई न उसका जग में !
अकेले इसलिए, मुंह को लटकाये 
बैठा है आंसू भरे आँखों में ।    
थप थप पाओं से नाचता था मजे से  
गोल-मोल गाल भरी फुर्ती 
गाता था वह सारादिन, सारेगामा टिमटिम 
मस्ती से गदगद मूर्ति। 
आज ही के दोपहर बैठा था छत पर
खा रहा था कच्चा केला ,
अचानक हुआ क्या , मामा मर गया क्या
या तो फिर पैर ही फिसला?
हुक्का-मुहा कहे भाई, ऐसा कुछ नहीं है 
देख ना रे कैसी ये उलझन 
मक्खियां मारने के तरीके ढूंढने 
सोच में ही बीत जाये सारादिन। 
दाहिने जो बैठे इस दुम झपटे 
मक्खी को मारूं मैं  फटाफट 
बाएं कोई आये भी , न जीतने पायेगी  
मारे उसे यह पूंछ झटपट। 
पर भाई कहो रे बीचोबीच ठहरे 
कोई पाजी, मारूं उसे कैसे ?
सोचो तो क्या मुसीबत लूँ फिर कौनसा पथ 
दो से ज्यादा पूंछ पाऊँ कहाँ से?   
    

चुटकियां।। 

(१) 
खामखा कुत्ते क्यों चिल्लाएं रात भर? 
रहे ना दाँत के कीड़े टूटे हुए दाँत पर?
किसकी गलती से है पृथ्वी के दबे सर?
चल भाई सोचे दोनों छाँव में बैठकर।

(२)
अरे छी छी राम राम दैया रे दैया,
कलकत्ते में देखा हमार रमैया-
पहिनके मखमली टोपी और कुर्ता,
खाये पीये नाचे गाये सड़क में भैया!

(३)
जंगली गांव के पगले बुड्ढे मुझसे पूछे कल 
ढाई बीघा समंदर में कितने फले कटहल?
 मैंने कहा उसी अंदाज़ में, बताऊँ मैं कितने? 
तेरे तुरई के खेत में मछली उगते जितने! 

(४) 
पता क्या बोल गया सीतानाथ दत्ता?
आसमान मँहकता दही जैसा खट्टा!
खट्टाई न रहती होने पर वर्षा,
देखा तब चाटकर मीठा शक्कर सा।

(५)
कहो भाई कहो रे, टेढ़ेमेढ़े गांव के 
वैदलोग भर्ता आलू का नहीं खाते हैं,
लिखा है किताबों में आलू से खोपड़ी में 
दिमाग न उपजे रे, भेजा सूख जाते हैं। 

(६)
गगन में खिला इंद्रधनुष आज  
देखें लोग छोड़कर सारे कामकाज। 
तभी नकचढ़ा बूढ़ा ताना मारता है-
देखते क्या, यह रंग पक्का नहीं है।  





- Translated by me from Sukumar Roy...

Original in Bengali:

'কেন সব কুকুরগুলো খামখা চেঁচায় রাতে-
কেন বল দাঁতের পোকা থাকেনা ফোক্‌লা দাঁতে?
পৃথিবীর চ্যাপ্টা মাথা কেন, সে কাদের দোষে?
এসো ভাই চিন্তা করি দুজনে ছায়ায় বসে ।'
 

বাংলা কবিতা- নিবেদন মাতঃ ।

নিবেদন মাতঃ ।।

আজকে জানাই মাতা লক্ষ্মীকে...
তোমার বাহন প্যাঁচা-পক্ষীকে
ত্যজ গো এবার, মিনতি তোমায়,
ওর স্পেসি জানো কি, লুপ্তপ্রায়?
তাকে আনো তুমি পূজা-প্যাণ্ডালে-
ঝলসানো আলো, চোখ ভরে জলে !
এবার মানেকা জানতে পারলে
নির্ঘাত মা গো ঠেলবেই জেলে ।
তার চেয়ে কোনও মন্ত্রিকে ধরে-
হেলিকপ্টার চেয়ে নাও ধারে ।
এবার তাহলে বনের প্যাঁচারে
দাও ছেড়ে, সেটা বনে যাক ফিরে ।।

18th Nov, 2012.